चीन में राज्य वैधता पर केंद्रित नौसैन्य राष्ट्रवाद की राजनीति

 

मोहम्मद आकिफ तौफीक

असिस्टेंट प्रोफेसर (राजनीति विज्ञान), राजकीय महाविद्यालय गणेशपुरा, बबीना, झांसी, उत्तर प्रदेश, भारत।

*Corresponding Author E-mail: akifgdc786@gmail.com

 

ABSTRACT:

चीन में जनवादी गणराज्य की स्थापना के समय साम्यवादी दल के शासन की वैधता माओ के करिश्माई नेतृत्व और जनयुद्ध की अवधारणा पर केन्द्रित था। परन्तु सांस्कृतिक क्रांति के दुष्परिणामों ने गंभीर आर्थिक समस्याओं को जन्म दिया। डेंग ने आर्थिक सुधार कार्यक्रमों द्वारा चीन में साम्यवाद के राजनीतिक पक्ष को अपरिवर्तित रखते हुए आर्थिक मोर्चे पर बाजारवादी प्रवृत्तियों का समावेश किया।      डेंग द्वारा इसको चीन की विशेषताओं से युक्त समाजवाद का अर्थात डेंग के द्वारा साम्यवादी दल के शासन की वैधता को बेहतर आर्थिक प्रदर्शन और नागरिकों के जीवन स्तर में गुणात्मक अभिवृद्धि द्वारा अर्जित किया गया। परन्तु तियानमेन स्क्वायर परिघटना और सोवियत संघ के पतन से उत्पन्न वैधता के संकट की चुनौती का समाधान जियांग जेमिन द्वारा राष्ट्रीय देशभक्ति शिक्षण अभियान द्वारा खोजा गया। हु जिन्ताओ द्वारा नवीन ऐतिहासिक मिशन की उद्घोषणा की गयी जिसमें नौसैन्य भूमिका को परिभाषित किया गया। सी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन की निरंतर आर्थिक संवृद्बि ने उसकी नौसैन्य क्षमताओं में अभिवृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया। चीन के नौसैन्य राष्ट्रवाद में निकट समुद्री क्षेत्रों में पड़ोसियों के साथ मैरीटाइम सीमाओं के निर्धारण, मैरीटाइम भूभागीय संप्रभुता, मैरीटाइम संसाधनों के स्वामित्व से सम्बन्धित ऐतिहासिक दावों के रक्षण और सुदूर समुद्री क्षेत्रों में चीन के आर्थिक/ऊर्जा हितों के रक्षण को शामिल किया गया है। अर्थात चीन के नौसैन्य राष्ट्रवाद में तटीय सुरक्षा, अपतटीय वास्तविक सुरक्षा और सुदूर समुद्र संरक्षण की मैरीटाइम सुरक्षा रणनीति को अभिव्यक्त एवं क्रियान्वित करने पर बल दिया गया है। परिणामस्वरुप चीन की नौसैन्य भूमिका, चीन के मैरीटाइम अधिकारों एवं हितों के रक्षण और समुद्री मार्ग से शताब्दियों के दमन की पुनरावृत्ति को रोकने, ऐतिहासिक अपमान के अवशेषों को मिटाने, भेदभावपूर्ण सन्धियों द्वारा चीन की भूमि हानि को पुनः प्राप्त करने, चीन के राष्ट्रीय एकीकरण को पूर्ण करने और चीन के राष्ट्रीय रिजुवनेशन हेतु चीन की नौसेना को एक विश्वस्तरीय नील जल नौसेना में परिवर्तित करने, और चीन की राष्ट्रीय पहचान को एक मैरीटाइम महान शक्ति में परिवर्तित करने पर बल दिया गया। प्रस्तुत शोध पत्र में चीन की राज्य वैधता पर केन्द्रित नौसैन्य राष्ट्रवाद की राजनीति के वर्णन का प्रयास किया गया है। अर्थात चीन में साम्यवादी दल के शासन की वैधता पर संकट और नौसैन्य राष्ट्रवाद की राजनीति के उदय में प्रत्यक्ष सम्बन्ध को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। अर्थात चीन के नौसैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम, नौसैन्य क्षमता विनिर्माण एवं संवर्द्धन एक विश्वस्तरीय नील जल नौसैन्य बल की स्थापना एक मैरीटाइम महान शक्ति में परिवर्तन की प्रेरणा चीन के राष्ट्रीय एकीकरण अर्थात राष्ट्रीय रिजुवनेशन की महत्वाकांक्षा पर आधारित है। इस शोध पत्र का उद्देश्य यह समझना है कि किस प्रकार चीन में नौसैन्य राष्ट्रवाद का उपयोग करके अपनी राजनीतिक वैधता को बनाने और सुदृढ़ करने का प्रयास किया जा रहा है। इस शोध पत्र में इस बात का भी परीक्षण किया जाएगा कि क्या यह रणनीति दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ है अथवा इससे क्षेत्रीय संघर्ष एवं शान्ति व स्थिरता की संभावना बढ़ेगी। प्रस्तुत शोध पत्र इस विश्लेषण पर भी केंद्रित है कि चीन की मैरीटाइम सुरक्षा रणनीति केवल बाह्य शक्ति प्रदर्शन, स्लाक्स व चेकप्वांट्स की सुरक्षा चीन के आर्थिक एवं ऊर्जा हितों के संरक्षण, सुदूर समुद्री संरक्षण अभियानों के संचालन पर केन्द्रित नहीं है बल्कि चीन की आन्तरिक राजनीति में साम्यवादी दल के शासन की वैधता पर केन्द्रित मैरीटाइम सीमाओं के निर्धारण, मैरीटाइम भूभागीय संप्रभुता से जुड़े मुद्दों, मैरीटाइम संसाधनों के स्वामित्व के दावों और ताइवान के एकीकरण जैसे राष्ट्रवादी मुद्दों का अनुसरण भी किया जा रहा है।

 

KEYWORDS: साम्यवादी दल, वैधता का संकट, देश भक्ति शिक्षण, शताब्दियों का दमन, नौसैन्य राष्ट्रवाद, मैरीटाइम महान शक्ति, राष्ट्रीय रिजुवनेशन ।

 

 


प्रस्तावना:-

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में चीन एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में अपनी पहचान को लगातार मजबूत कर रहा है। विशेष रूप से उसकी समुद्री शक्ति (naval power) और उससे जुड़ा राष्ट्रवाद न केवल अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर रहा है, बल्कि घरेलू स्तर पर भी राज्य की वैधता (state legitimacy) को सुदृढ़ करने का एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है। ‘‘चीन में राज्य वैधता पर केंद्रित नौसैन्य राष्ट्रवाद की राजनीति‘‘ इसी जटिल अंतर्संबंध को समझने का प्रयास करता है, जहाँ समुद्री विस्तार, राष्ट्रीय गौरव और राजनीतिक नियंत्रण एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

 

राज्य वैधता से आशय उस स्वीकार्यता से है जो किसी सरकार को जनता से प्राप्त होती है। चीन के संदर्भ में यह वैधता पारंपरिक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, राजनीतिक स्थिरता और राष्ट्रवादी भावनाओं के निर्माण से आती है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने पिछले कुछ दशकों में आर्थिक प्रगति के माध्यम से अपनी वैधता को मजबूत किया है, लेकिन जैसे-जैसे आर्थिक वृद्धि की गति में उतार.चढ़ाव देखने को मिल रहा है, वैसे-वैसे सरकार वैधता बनाए रखने के नए साधनों की तलाश कर रही है। इसी संदर्भ में नौसैन्य राष्ट्रवाद एक प्रभावी उपकरण के रूप में उभरकर सामने आया है।

 

नौसैन्य राष्ट्रवाद (Naval Nationalism) का अर्थ है - समुद्री शक्ति, नौसेना के विस्तार और समुद्री क्षेत्रों पर नियंत्रण को राष्ट्रीय गौरव और पहचान से जोड़ना। चीन ने इस विचारधारा को न केवल अपनी विदेश नीति में शामिल किया है, बल्कि इसे घरेलू स्तर पर भी व्यापक रूप से प्रचारित किया है। विशेषकर “Century of Humilation” (अपमान की शताब्दी)  की ऐतिहासिक स्मृति को आधार बनाकर यह संदेश दिया जाता है कि एक सशक्त नौसेना ही चीन को पुनः महान बना सकती है (Callahan,2010)  इस प्रकार, समुद्री शक्ति का विकास केवल रणनीतिक आवश्यकता नहीं रह जाता, बल्कि यह राष्ट्रीय आत्मसम्मान और राजनीतिक वैधता का प्रश्न बन जाता है।

 

इस विषय का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि हिंद.प्रशांत (Indo - Pacific) क्षेत्र आज वैश्विक राजनीति का केंद्र बन चुका है। चीन की बढ़ती नौसैन्य गतिविधियाँ - विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर (South China Sea) में - क्षेत्रीय और वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रही हैं। यहाँ चीन द्वारा कृत्रिम द्वीपों का निर्माण, सैन्य ठिकानों की स्थापना और क्षेत्रीय दावों का आक्रामक समर्थन इस बात का संकेत है कि वह अपनी समुद्री सीमाओं को लेकर अत्यंत संवेदनशील है। यह संवेदनशीलता केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राष्ट्रवादी भावना और घरेलू राजनीतिक वैधता भी गहराई से जुड़ी हुई है (Fravel, 2019)।

 

एक महत्वपूर्ण उदाहरण दक्षिण चीन सागर विवाद का है। चीन ‘‘नौ-डैश लाइन‘‘ के आधार पर इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्से पर अपना दावा करता है, जबकि वियतनाम फिलीपींस और अन्य देश भी इन क्षेत्रों पर दावा करते हैं। 2016 में स्थायी पंचाट न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) ने फिलीपींस के पक्ष में फैसला दिया और चीन के दावों को अस्वीकार कर दिया। इसके बावजूद, चीन ने इस निर्णय को खारिज कर दिया और अपनी गतिविधियाँ जारी रखीं। इस स्थिति में चीनी सरकार ने घरेलू मीडिया और राजनीतिक विमर्श के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया कि वह राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता की रक्षा कर रही है। इस प्रकार, बाहरी विवाद को आंतरिक समर्थन जुटाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया, जो राज्य वैधता को मजबूत करने की रणनीति को दर्शाता है ( Hayton, 2014) ।

 

अंततः, यह विषय न केवल चीन की विदेश नीति को समझने में सहायक है, बल्कि यह भी बताता है कि आधुनिक विश्व में राष्ट्रवाद और सैन्य शक्ति का उपयोग किस प्रकार घरेलू राजनीतिक वैधता को बनाए रखने के लिए किया जाता है। इस दृष्टि से, यह अध्ययन समकालीन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा अध्ययन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है।

 

2. सैद्धांतिक एवं वैचारिक ढाँचा: 

किसी भी शोध को गहराई और विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए उसका सैद्धांतिक एवं वैचारिक ढाँचा अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। ‘‘चीन में राज्य वैधता पर केंद्रित नौसैन्य राष्ट्रवाद की राजनीति‘‘ को समझने के लिए विभिन्न सिद्धांतों - जैसे राज्य वैधता, राष्ट्रवाद, समुद्री शक्ति और अंतर्राष्ट्रीय संबंध सिद्धांत - का समन्वित विश्लेषण आवश्यक है। ये सभी सिद्धांत इस बात को स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार चीन अपनी समुद्री शक्ति को केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक और राजनीतिक उपकरण के रूप में भी उपयोग करता है।

 

सबसे पहले, राज्य वैधता (State Legitimacy)  की अवधारणा को समझना जरूरी है। मैक्स वेबर (Max Weber) ने वैधता को तीन प्रकारों में विभाजित किया है – पारंपरिक (Traditional), करिश्माई (Charismatic) और विधिक.तार्किक (Legal- Rational) चीन के संदर्भ में, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) मुख्य रूप से विधिक तार्किक और प्रदर्शन आधारित (Performance – based legitimacy) वैधता पर निर्भर करती है। यहाँ लोकतांत्रिक चुनावों की अनुपस्थिति में सरकार अपनी वैधता आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता के माध्यम से स्थापित करती है (Weber 1978)। हाल के वर्षों में, राष्ट्रवाद-विशेष रूप से नौसैन्य राष्ट्रवाद - इस वैधता को मजबूत करने का एक प्रमुख साधन बन गया है।

 

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू राष्ट्रवाद (Nationalism) का है। बेनेडिक्ट एंडरसन (Benedict Anderson)। ने राष्ट्र को “Imagined Community”  के रूप में परिभाषित किया, जहाँ लोग एक साझा पहचान और भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं, भले ही वे एक.दूसरे को व्यक्तिगत रूप से न जानते हों (Anderson,1983)। चीन में यह कल्पित समुदाय ऐतिहासिक स्मृतियों,  सांस्कृतिक गौरव और बाहरी खतरों के माध्यम से निर्मित किया जाता है। “Century of Humiliation“ की अवधारणा - जब चीन को पश्चिमी शक्तियों और जापान द्वारा अपमानित किया गया- आज भी राष्ट्रवादी विमर्श का एक केंद्रीय तत्व है। इस ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए, चीन की नौसैन्य शक्ति को राष्ट्रीय पुनरुत्थान (national rejuvenation)  के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

 

एंथनी डी. स्मिथ (Anthony D. Smith) का एथ्नो-सिंबॉलिज्म (ethno- symbolism) सिद्धांत भी यहाँ प्रासंगिक है, जो बताता है कि राष्ट्रवाद ऐतिहासिक प्रतीकों, मिथकों और स्मृतियों पर आधारित होता है (Smith, 1991)। चीन के मामले में, समुद्र और उससे जुड़ी शक्ति को एक ऐसे प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो देश की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर सकता है। इस प्रकारए नौसैन्य विस्तार केवल एक सैन्य रणनीति नहीं रह जाता, बल्कि यह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा बन जाता है।

 

तीसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत समुद्री शक्ति (Sea Power) का है, जिसे अल्फ्रेड थायर महन ( Alfred Thayer Mahan) ने विस्तार से प्रस्तुत किया। महन के अनुसार, किसी भी राष्ट्र की वैश्विक शक्ति उसकी समुद्री क्षमता पर निर्भर करती है - जिसमें मजबूत नौसेना, व्यापारिक जहाज और रणनीतिक समुद्री मार्गों पर नियंत्रण शामिल है (Mahan,1890)। चीन ने इस सिद्धांत को अपनाते हुए अपनी नौसेना (PLA Navy) का तेजी से आधुनिकीकरण किया है और “Blue Water Navy”  की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसका उद्देश्य केवल क्षेत्रीय सुरक्षा नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर शक्ति प्रदर्शन करना भी है।

 

चौथा पहलू अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के यथार्थवादी (Realist) और नव – यथार्थवादी (Neorealist) सिद्धांतों से जुड़ा है। यथार्थवाद के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली अराजक (anarchic) होती है, जहाँ प्रत्येक राष्ट्र अपनी सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है (Waltz, 1979)। इस दृष्टिकोण सेए चीन की नौसैन्य रणनीति को उसकी सुरक्षा चिंताओं और शक्ति संतुलन की राजनीति के संदर्भ में समझा जा सकता है। विशेष रूप से अमेरिका के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा और हिंद - प्रशांत क्षेत्र में उसकी उपस्थिति चीन को अपनी समुद्री शक्ति बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है।

 

नव.यथार्थवाद (Neorealism) इस बात पर जोर देता है कि अंतर्राष्ट्रीय संरचना (International Structure) ही राज्यों के व्यवहार को निर्धारित करती है। चीन के मामले में वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव और अमेरिका की प्रभुत्वशाली स्थिति उसे अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रक्रिया में नौसैन्य राष्ट्रवाद एक ऐसा माध्यम बन जाता है जो बाहरी रणनीति और आंतरिक वैधता दोनों को जोड़ता है।

 

एक व्यावहारिक उदाहरण के रूप में दक्षिण चीन सागर (South China Sea) को देखा जा सकता है। यहाँ चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति और कृत्रिम द्वीपों का निर्माण न केवल रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसे घरेलू स्तर पर राष्ट्रीय गौरव के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है। जब 2016 में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने चीन के दावों को अस्वीकार किया, तब भी चीनी सरकार ने इस निर्णय को नकारते हुए इसे राष्ट्रीय संप्रभुता का मुद्दा बना दिया। यह दर्शाता है कि किस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय कानून और घरेलू राजनीति के बीच संतुलन बनाते हुए राष्ट्रवाद का उपयोग किया जाता है (Fravel,2019)।

 

अंततः, यह सैद्धांतिक ढाँचा यह स्पष्ट करता है कि चीन की नौसैन्य नीतियाँ केवल सैन्य या आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं समझी जा सकतीं। वे राज्य वैधता, राष्ट्रवाद और अंतर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन के जटिल अंतर्संबंध का परिणाम हैं। इन सभी सिद्धांतों का समेकित विश्लेषण हमें यह समझने में मदद करता है कि क्यों और कैसे चीन नौसैन्य राष्ट्रवाद को अपनी राजनीतिक रणनीति का एक अभिन्न हिस्सा बना रहा है।

 

3. चीन में राज्य वैधता का स्वरूप:

चीन में राज्य वैधता (State Legitimacy) का स्वरूप पारंपरिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से भिन्न है। यहाँ वैधता का आधार चुनावी प्रक्रिया के बजाय राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक विकास, सामाजिक नियंत्रण और राष्ट्रवादी भावनाओं के निर्माण पर अधिक निर्भर करता है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (Chinese Communist Party – CCP) 1949 से सत्ता में है और उसने समय के साथ अपनी वैधता को बनाए रखने के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाई हैं। वर्तमान दौर में यह वैधता बहुआयामी स्वरूप ले चुकी है, जिसमें आर्थिक प्रदर्शन, वैचारिक नियंत्रण और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

 

सबसे पहले, चीन में राज्य वैधता का प्रमुख आधार आर्थिक विकास रहा है। 1978 के बाद देंग शियाओपिंग के आर्थिक सुधारों ने चीन को तीव्र विकास के मार्ग पर अग्रसर किया। करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालनाए औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना और वैश्विक व्यापार में प्रमुख भूमिका निभाना इन सबने CCP की वैधता को मजबूत किया। इस प्रकार, “performance-based legitimacy” या प्रदर्शन आधारित वैधता चीन की राजनीतिक व्यवस्था की केंद्रीय विशेषता बन गई (Zhao, 2009)। जनता के लिए सरकार की स्वीकार्यता इस बात पर निर्भर करती है कि वह उनकी जीवन स्तर में कितना सुधार ला पा रही है।

 

हालांकि, केवल आर्थिक विकास पर निर्भर रहना दीर्घकालिक रूप से पर्याप्त नहीं है। हाल के वर्षों में आर्थिक वृद्धि दर में कमी, बेरोजगारी की समस्या और सामाजिक असमानताओं ने सरकार के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं। ऐसे में CCP ने अपनी वैधता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रवाद (nationalism) को एक वैकल्पिक साधन के रूप में विकसित किया है। राष्ट्रवाद के माध्यम से सरकार यह संदेश देती है कि वह चीन की संप्रभुताए एकता और वैश्विक प्रतिष्ठा की रक्षा कर रही है।

 

चीन में राष्ट्रवाद का स्वरूप मुख्यतः “State-led nationalism है, अर्थात इसे सरकार द्वारा नियंत्रित और प्रोत्साहित किया जाता है। शिक्षा प्रणाली, मीडिया और सांस्कृतिक अभियानों के माध्यम से नागरिकों में राष्ट्रीय गौरव और ऐतिहासिक चेतना को बढ़ावा दिया जाता है। “Century of Humiliation” की ऐतिहासिक स्मृति को बार.बार दोहराया जाता है, ताकि यह दिखाया जा सके कि वर्तमान सरकार चीन को फिर से एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के मिशन पर काम कर रही है (Callahan 2010)। इस प्रकार, राष्ट्रवाद केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि एक राजनीतिक उपकरण बन जाता है।

 

इसी संदर्भ में, नौसैन्य राष्ट्रवाद (Naval Nationalism) राज्य वैधता के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभरता है। चीन की बढ़ती समुद्री शक्ति - विशेष रूप से PLA Navy का आधुनिकीकरण को राष्ट्रीय गौरव और सुरक्षा से जोड़ा जाता है। सरकार यह दर्शाने का प्रयास करती है कि एक मजबूत नौसेना ही चीन को बाहरी खतरों से सुरक्षित रख सकती है और उसकी वैश्विक स्थिति को मजबूत कर सकती है। इस प्रकार, नौसैन्य विस्तार को घरेलू समर्थन प्राप्त करने के लिए एक प्रतीकात्मक माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

 

एक महत्वपूर्ण उदाहरण दक्षिण चीन सागर (South China Sea) विवाद का है। चीन इस क्षेत्र पर अपने ऐतिहासिक अधिकार का दावा करता है और ‘‘नौ डेश लाइन‘‘ के माध्यम से इसे वैध ठहराने की कोशिश करता है। जब 2016 में स्थायी पंचाट न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) ने चीन के दावों को खारिज कर दिया, तब भी CCP ने इस निर्णय को अस्वीकार करते हुए इसे राष्ट्रीय संप्रभुता का मुद्दा बना दिया। घरेलू मीडिया और सरकारी बयानों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि चीन किसी भी बाहरी दबाव के सामने नहीं झुकेगा। इस तरह, एक अंतर्राष्ट्रीय विवाद को घरेलू वैधता को मजबूत करने के साधन के रूप में उपयोग किया गया (Hayton,2014)।

 

इसके अतिरिक्त, चीन में राज्य वैधता को बनाए रखने के लिए सूचना नियंत्रण (Information Control) भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इंटरनेट सेंसरशिप, मीडिया पर नियंत्रण और असहमति को सीमित करने के माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित करती है कि केवल वही नैरेटिव सामने आए जो उसकी नीतियों के अनुकूल हो। इस प्रक्रिया में राष्ट्रवाद और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को विशेष महत्व दिया जाता है, जिससे जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं से हटाकर बाहरी खतरों की ओर केंद्रित किया जा सके (Shirk, 2011)।

 

हालांकि, इस प्रकार की वैधता के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं। अत्यधिक राष्ट्रवाद कभी-कभी सरकार के लिए ही दबाव का कारण बन सकता है, क्योंकि जनता की अपेक्षाएँ बढ़ जाती हैं। यदि सरकार किसी अंतर्राष्ट्रीय विवाद में पीछे हटती है, तो उसे घरेलू आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, आर्थिक समस्याएँ और सामाजिक असमानताएँ भी वैधता को प्रभावित कर सकती हैं।

 

अंततः, चीन में राज्य वैधता का स्वरूप एक गतिशील और बहुआयामी प्रक्रिया है, जिसमें आर्थिक प्रदर्शन, राष्ट्रवाद, सैन्य शक्ति और सूचना नियंत्रण सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। नौसैन्य राष्ट्रवाद इस संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है, जो न केवल बाहरी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम है, बल्कि आंतरिक राजनीतिक स्थिरता और वैधता को बनाए रखने का भी एक प्रभावी उपकरण है। इस प्रकार, चीन की राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए राज्य वैधता और राष्ट्रवाद के इस अंतर्संबंध का विश्लेषण अत्यंत आवश्यक है।

 

4. नौसैन्य राष्ट्रवाद की अवधारणा और चीन:

नौसैन्य राष्ट्रवाद (Naval Nationalism)  एक ऐसी अवधारणा है जिसमें किसी राष्ट्र की समुद्री शक्ति, नौसेना के विस्तार और समुद्री क्षेत्रों पर नियंत्रण को राष्ट्रीय गौरव, पहचान और संप्रभुता से जोड़कर देखा जाता है। यह केवल सैन्य रणनीति तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह एक वैचारिक और राजनीतिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से राज्य अपने नागरिकों में राष्ट्रवादी भावनाओं को जागृत करता है और अपनी वैधता को सुदृढ़ करता है। चीन के संदर्भ में यह अवधारणा विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है,  क्योंकि यहाँ नौसैन्य शक्ति का विकास सीधे तौर पर राष्ट्रीय पुनरुत्थान (national rejuvenation) और ऐतिहासिक गौरव से जुड़ा हुआ है।

 

चीन में नौसैन्य राष्ट्रवाद की जड़ें उसके ऐतिहासिक अनुभवों में निहित हैं। “Century of Humilation “ (1839-1949)  का दौर, जब चीन को पश्चिमी शक्तियों और जापान के हाथों पराजय और अपमान का सामना करना पड़ा, आज भी उसकी राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस ऐतिहासिक स्मृति को चीनी सरकार द्वारा बार बार दोहराया जाता है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि एक मजबूत और आधुनिक नौसेना ही ऐसे अपमान को दोबारा होने से रोक सकती है (Callahan, 2010)। इस प्रकार, समुद्री शक्ति को केवल सुरक्षा के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

 

नौसैन्य राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण तत्व ‘‘समुद्र का पुनःअधिकार‘‘ (reclaiming the seas) है। चीन यह मानता है कि दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर के कुछ हिस्सों पर उसका ऐतिहासिक अधिकार रहा है, जिसे वह पुनः स्थापित करना चाहता है। इस विचार को घरेलू स्तर पर इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो यह केवल भू.राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय न्याय और ऐतिहासिक अधिकार की बहाली का प्रश्न हो। इस प्रकारए समुद्री दावों को राष्ट्रवादी भावनाओं के साथ जोड़ दिया जाता है, जिससे जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त होता है (Hayton,2014)।

 

चीन में नौसैन्य राष्ट्रवाद के विकास में राज्य की सक्रिय भूमिका रही है। इसे “State-led nationalism” के रूप में समझा जा सकता है, जहाँ सरकार स्वयं राष्ट्रवादी विमर्श को नियंत्रित और दिशा - निर्देशित करती है। शिक्षा प्रणाली, मीडिया और आधिकारिक वक्तव्यों के माध्यम से यह प्रचारित किया जाता है कि चीन का भविष्य उसकी समुद्री शक्ति पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिएए चीनी फिल्मों, डॉक्यूमेंट्री और समाचारों में नौसेना की उपलब्धियों को बड़े पैमाने पर दिखाया जाता है,  जिससे जनता में गर्व और समर्थन की भावना उत्पन्न होती है।

 

एक महत्वपूर्ण उदाहरण 2012 के बाद का समय है, जब शी जिनपिंग के नेतृत्व में “Chinese Dream” (चीनी सपना) की अवधारणा को बढ़ावा दिया गया। इस विचारधारा में चीन को एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य शामिल है, जिसमें मजबूत नौसेना एक केंद्रीय भूमिका निभाती है। PLA Navy (People’s Liberation Army Navy) के आधुनिकीकरण, विमानवाहक पोतों (aircraft Carriers) के निर्माण और दूर-दराज के समुद्री क्षेत्रों में सैन्य उपस्थिति को इस ‘‘चीनी सपने‘‘ के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया जाता है (Fravel 2019)। इस प्रकार, नौसैन्य विस्तार को राष्ट्रवाद के साथ जोड़कर एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जाता है।

 

दक्षिण चीन सागर (South China Sea) इस संदर्भ में एक प्रमुख केस स्टडी के रूप में सामने आता है। यहाँ चीन ने कृत्रिम द्वीपों का निर्माण किया है और उन पर सैन्य ठिकाने स्थापित किए हैं। इन गतिविधियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ा है, लेकिन घरेलू स्तर पर इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जब 2016 में अंतर्राष्ट्रीय पंचाट न्यायालय ने चीन के दावों को खारिज किया तब चीनी सरकार ने इस निर्णय को अस्वीकार करते हुए इसे विदेशी हस्तक्षेप के रूप में चित्रित किया। इस प्रकार, बाहरी आलोचना को आंतरिक राष्ट्रवाद को और अधिक मजबूत करने के लिए उपयोग किया गया (Permanent Court of Arbitration 2016)।

 

इसके अलावा सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी नौसैन्य राष्ट्रवाद के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चीनी नागरिक ऑनलाइन माध्यमों के जरिए सैन्य उपलब्धियों पर गर्व व्यक्त करते हैं और सरकार के रुख का समर्थन करते हैं। हालाँकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह राष्ट्रवाद पूरी तरह स्वतःस्फूर्त नहीं है, बल्कि इसे राज्य द्वारा नियंत्रित और निर्देशित किया जाता है।

 

हालांकि, नौसैन्य राष्ट्रवाद के कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं। अत्यधिक राष्ट्रवाद क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा सकता है और अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष की संभावना को जन्म दे सकता है। इसके अलावा, यदि सरकार अपनी आक्रामक नीतियों को बनाए रखने में असफल रहती है, तो उसे घरेलू स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। इस प्रकार, यह रणनीति अवसर और जोखिम दोनों को साथ लेकर चलती है।

 

अंततः, चीन में नौसैन्य राष्ट्रवाद एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जिसमें इतिहास, राजनीति, सुरक्षा और पहचान सभी का समावेश होता है। यह न केवल चीन की विदेश नीति को प्रभावित करता है, बल्कि उसकी घरेलू राजनीतिक वैधता को भी मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस दृष्टिकोण सेए नौसैन्य राष्ट्रवाद को समझना चीन के समग्र राजनीतिक और रणनीतिक व्यवहार को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

 

5.चीन की नौसैन्य रणनीति:

चीन की नौसैन्य रणनीति (Naval Strategy) पिछले दो दशकों में तेजी से विकसित हुई है और यह अब केवल तटीय रक्षा (Coastal defense) तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वैश्विक स्तर पर शक्ति प्रदर्शन (Power Projection)  की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस परिवर्तन के पीछे न केवल सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएँ हैं, बल्कि आर्थिक हित, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव को बढ़ाने की आकांक्षा भी शामिल है। इसी कारण, चीन की नौसेना - पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLA Navy) आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती नौसेनाओं में से एक मानी जाती है।

 

चीन की नौसैन्य रणनीति का एक प्रमुख तत्व ‘‘ब्लू वॉटर नेवी‘‘ (Blue Water Navy) का निर्माण है। इसका अर्थ है ऐसी नौसेना जो दूर-दराज के महासागरों में भी प्रभावी रूप से संचालन कर सके। इसके तहत चीन ने विमानवाहक पोत (aircraft carries) परमाणु पनडुब्बियाँ और उन्नत युद्धपोत विकसित किए हैं। यह रणनीति चीन को हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ-साथ अफ्रीका और मध्य पूर्व तक अपनी समुद्री उपस्थिति बढ़ाने में सक्षम बनाती है (Fravel 2019)।

 

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू “Maritime Silk Road” है, जो बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का समुद्री भाग है। इसके माध्यम से चीन एशिया, अफ्रीका और यूरोप को समुद्री मार्गों से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। यह केवल आर्थिक परियोजना नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से चीन रणनीतिक बंदरगाहों (Strategic Ports) और लॉजिस्टिक नेटवर्क का निर्माण कर रहा है जो उसकी नौसैन्य क्षमता को भी मजबूत करते हैं। उदाहरण के लिएए जिबूती (Djibouti) में चीन का पहला विदेशी सैन्य अड्डा इस रणनीति का हिस्सा है।

 

दक्षिण चीन सागर (South China Sea) चीन की नौसैन्य रणनीति का केंद्र बिंदु है। यहाँ चीन ने कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर उन पर हवाई पट्टियाँ, रडार सिस्टम और मिसाइल तैनात किए हैं। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ से दुनिया के लगभग एक-तिहाई समुद्री व्यापार गुजरता है। चीन इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर न केवल अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना चाहता है, बल्कि अपनी क्षेत्रीय प्रभुत्व (regional dominance) को भी मजबूत करना चाहता है (Hayton,2014) ।

 

एक प्रमुख केस स्टडी के रूप में 2013 के बाद स्प्रैटली द्वीप समूह (Spratly Islands) में चीन की गतिविधियों को देखा जा सकता है। चीन ने यहाँ बड़े पैमाने पर भूमि पुनर्निर्माण (land reclamation) कर सैन्य ठिकाने स्थापित किए। अंतर्राष्ट्रीय आलोचना के बावजूद, चीन ने इन गतिविधियों को जारी रखा और इन्हें अपनी संप्रभुता की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि उसकी नौसैन्य रणनीति केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक (assertive) भी है।

 

इसके अतिरिक्त, ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) और पूर्वी चीन सागर (East China Sea) में भी चीन की नौसैन्य गतिविधियाँ बढ़ी हैं। ताइवान को लेकर चीन का रुख विशेष रूप से संवेदनशील है, और यहाँ उसकी नौसैन्य उपस्थिति संभावित संघर्ष की स्थिति को दर्शाती है। इस प्रकार, चीन की नौसैन्य रणनीति बहु-आयामी है, जिसमें सुरक्षाए अर्थव्यवस्था और राजनीति सभी जुड़े हुए हैं।

 

6.राज्य वैधता और नौसैन्य राष्ट्रवाद का संबंध:

चीन में राज्य वैधता और नौसैन्य राष्ट्रवाद के बीच गहरा और परस्पर निर्भर संबंध है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) अपनी राजनीतिक वैधता को बनाए रखने के लिए विभिन्न साधनों का उपयोग करती है, जिनमें राष्ट्रवाद एक प्रमुख उपकरण है। नौसैन्य राष्ट्रवाद इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है, क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षाए संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा जैसे मुद्दों को सीधे जनता की भावनाओं से जोड़ता है।

सबसे पहले, सरकार बाहरी खतरों (external threats) को उजागर कर घरेलू समर्थन को मजबूत करती है। अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा को इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि चीन को अपनी संप्रभुता और हितों की रक्षा के लिए मजबूत नौसेना की आवश्यकता है। इस प्रकार, बाहरी दबावों को आंतरिक एकता और समर्थन के साधन में बदल दिया जाता है (Waltz 1979)।

 

दूसरा, नौसैन्य उपलब्धियों को घरेलू स्तर पर बड़े पैमाने पर प्रचारित किया जाता है। नए युद्धपोतों का निर्माण, सैन्य अभ्यास और अंतर्राष्ट्रीय मिशनों में भागीदारी को मीडिया के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि यह राष्ट्रीय गौरव का विषय बन जाए। इससे जनता में यह विश्वास पैदा होता है कि सरकार देश को सुरक्षित और शक्तिशाली बना रही है।

 

दक्षिण चीन सागर विवाद एक बार फिर इस संबंध को स्पष्ट करता है। जब अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने 2016 में चीन के दावों को खारिज कियाए तब CCP ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय सम्मान और संप्रभुता से जोड़ दिया। घरेलू स्तर पर यह संदेश दिया गया कि सरकार किसी भी बाहरी हस्तक्षेप के सामने नहीं झुकेगी। इससे जनता का समर्थन सरकार के पक्ष में मजबूत हुआ, भले ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसे आलोचना का सामना करना पड़ा (Permanent Court of Arbitration,2016)।

 

तीसरा, नौसैन्य राष्ट्रवाद का उपयोग आंतरिक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए भी किया जाता है। आर्थिक चुनौतियाँ, बेरोजगारी या सामाजिक असमानताएँ जैसे मुद्दे जनता में असंतोष पैदा कर सकते हैं। ऐसे में सरकार राष्ट्रवादी मुद्दों -विशेष रूप से समुद्री विवादों - को प्रमुखता देकर जनता का ध्यान बाहरी मामलों की ओर मोड़ देती है (Shirk, 2011)।

 

हालांकि, यह संबंध पूरी तरह से जोखिम रहित नहीं है। अत्यधिक राष्ट्रवाद कभी-कभी सरकार के लिए ही चुनौती बन सकता है। यदि जनता की अपेक्षाएँ बहुत अधिक बढ़ जाती हैं और सरकार उन्हें पूरा नहीं कर पाती, तो वैधता पर प्रश्न उठ सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि चीन किसी विवाद में समझौता करता है, तो उसे घरेलू आलोचना का सामना करना पड़ सकता है।

 

अंततः, यह स्पष्ट है कि चीन में नौसैन्य राष्ट्रवाद और राज्य वैधता एक-दूसरे को मजबूत करने वाले तत्व हैं। जहाँ नौसैन्य शक्ति सरकार को राष्ट्रीय गौरव और सुरक्षा का प्रतीक प्रदान करती हैए वहीं राष्ट्रवाद उस शक्ति को वैधता में परिवर्तित करने का कार्य करता है। इस प्रकार, यह संबंध चीन की घरेलू राजनीति और विदेश नीति दोनों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 

7.केस स्टडी: (Case Studies)

चीन में नौसैन्य राष्ट्रवाद और राज्य वैधता के संबंध को समझने के लिए कुछ प्रमुख केस स्टडी अत्यंत उपयोगी हैं। ये उदाहरण दिखाते हैं कि किस प्रकार चीन बाहरी समुद्री विवादों का उपयोग घरेलू समर्थन जुटाने और अपनी राजनीतिक वैधता को मजबूत करने के लिए करता है।

 

(क) दक्षिण चीन सागर विवाद: (South China Sea Dispute)

यह सबसे महत्वपूर्ण केस स्टडी है। चीन ‘‘नौ-डेश लाइन‘‘ के आधार पर इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्से पर दावा करता है। 2013 से 2016 के बीच चीन ने स्प्रैटली द्वीपों में बड़े पैमाने पर कृत्रिम द्वीपों का निर्माण किया और उन पर सैन्य ठिकाने स्थापित किए। 2016 में स्थायी पंचाट न्यायालय (PCA) ने चीन के दावों को अवैध घोषित किया, लेकिन चीन ने इस निर्णय को अस्वीकार कर दिया। घरेलू स्तर पर इसे राष्ट्रीय संप्रभुता और सम्मान का मुद्दा बनाकर प्रस्तुत किया गया, जिससे सरकार के प्रति समर्थन बढ़ा (Hayton 2014)। यह स्पष्ट करता है कि कैसे बाहरी विवाद को आंतरिक वैधता के साधन में बदला गया।

 

(ख) ताइवान जलडमरूमध्य: (Taiwan Strait Tensions)

ताइवान चीन के लिए एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है। हाल के वर्षों में चीन ने ताइवान के आसपास अपने नौसैन्य अभ्यासों को बढ़ाया है। इन गतिविधियों को घरेलू स्तर पर‘‘राष्ट्रीय एकता‘‘ (National Unity) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उदाहरण के लिएए 2022 में अमेरिकी प्रतिनिधि नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद चीन ने बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास किएए जिन्हें चीनी मीडिया ने राष्ट्रीय शक्ति और संप्रभुता की रक्षा के रूप में चित्रित किया। इससे घरेलू राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिला और सरकार की वैधता मजबूत हुई (Fravel 2019)।

 

(ग) सेनकाकू/दियाओयू द्वीप विवाद: (East China Sea)

जापान और चीन के बीच इन द्वीपों को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। चीन इन द्वीपों को अपने ऐतिहासिक क्षेत्र का हिस्सा मानता है। जब भी इस मुद्दे पर तनाव बढ़ता है, चीन में राष्ट्रवादी भावनाएँ उभरती हैं। सरकार इन भावनाओं को नियंत्रित तरीके से उपयोग कर अपने पक्ष में समर्थन जुटाती है। यह दर्शाता है कि सीमित स्तर पर संघर्ष और तनाव को भी राजनीतिक रूप से उपयोगी बनाया जा सकता है (Smith,1991)।

 

इन सभी केस स्टडी से यह स्पष्ट होता है कि चीन की नौसैन्य गतिविधियाँ केवल सुरक्षा रणनीति का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे घरेलू राजनीति और राज्य वैधता से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं।

 

8. अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव: (Global Implications)

चीन की नौसैन्य राष्ट्रवाद आधारित रणनीति का प्रभाव केवल उसके घरेलू राजनीतिक परिदृश्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर भी व्यापक असर डालती है। विशेष रूप से हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

 

सबसे पहले, यह रणनीति क्षेत्रीय शक्ति संतुलन (Balance of Power) को प्रभावित करती है। चीन की बढ़ती नौसैन्य शक्ति अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए चुनौती बन रही है। इसके परिणामस्वरूप, जैसे समूहों का गठन हुआ है, जो चीन के प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास करते हैं (Waltz 1979)। इस प्रकार, चीन की नीति ने क्षेत्र में एक नई रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है।

 

दूसरा, दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक नीति। देशों के लिए चिंता का विषय है। वियतनाम, फिलीपींस और मलेशिया जैसे देश चीन के दावों का विरोध करते हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है। यह स्थिति समुद्री व्यापार और सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर सकती है, क्योंकि यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख मार्ग है (Hayton,2014)।

 

तीसरा, वैश्विक स्तर पर यह रणनीति अंतर्राष्ट्रीय कानून और संस्थाओं को चुनौती देती है। 2016 के PCA निर्णय को अस्वीकार कर चीन ने यह संकेत दिया कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को अंतर्राष्ट्रीय नियमों से ऊपर रख सकता है। इससे वैश्विक व्यवस्था (global order) पर भी प्रभाव पड़ता है।

 

 इसके अलावा, चीन की नौसैन्य उपस्थिति अफ्रीका और मध्य पूर्व तक फैल रही है, जैसे जिबूती में उसका सैन्य अड्डा। इससे यह स्पष्ट होता है कि चीन अब एक क्षेत्रीय शक्ति से आगे बढ़कर वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में काम कर रहा है। इस प्रकार, उसकी नौसैन्य रणनीति अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के स्वरूप को बदलने की क्षमता रखती है।

 

9.आलोचनात्मक विश्लेषण: (Critical Analysis)

हालांकि चीन की नौसैन्य राष्ट्रवाद आधारित रणनीति ने उसकी राज्य वैधता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इसके कुछ सीमाएँ और जोखिम भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे पहले, अत्यधिक राष्ट्रवाद (Over – nationalism) एक दोधारी तलवार की तरह होता है। यह अल्पकाल में सरकार को समर्थन दिला सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह जनता की अपेक्षाओं को इतना बढ़ा देता है कि सरकार के लिए उन्हें पूरा करना कठिन हो जाता है। यदि चीन किसी विवाद में समझौता करता है, तो उसे घरेलू स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। दूसरा, यह रणनीति क्षेत्रीय संघर्ष (regional conflict) के जोखिम को बढ़ाती है। दक्षिण चीन सागर और ताइवान जैसे मुद्दे पहले से ही संवेदनशील हैं, और नौसैन्य शक्ति का आक्रामक प्रदर्शन इन क्षेत्रों में सैन्य टकराव की संभावना को बढ़ा सकता है। यह न केवल चीन के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए अस्थिरता का कारण बन सकता है (Fravel 2019)।

 

तीसरा, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियाँ भी इस मॉडल की स्थिरता पर प्रश्न उठाती हैं। यदि चीन की आर्थिक वृद्धि धीमी पड़ती है, तो केवल राष्ट्रवाद के आधार पर वैधता बनाए रखना कठिन हो सकता है। जनता की प्राथमिकताएँ समय के साथ बदलती हैं, और वे बेहतर जीवन स्तर की अपेक्षा करती हैं।

 

चौथा, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती आलोचना और अविश्वास भी चीन के लिए चुनौती बन सकता है। यदि अन्य देश चीन को एक आक्रामक शक्ति के रूप में देखने लगते हैं, तो उसके खिलाफ गठबंधन मजबूत हो सकते हैं, जिससे उसकी रणनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है।

 

अंततः, यह कहा जा सकता है कि चीन की नौसैन्य राष्ट्रवाद आधारित रणनीति प्रभावी तो है, लेकिन पूरी तरह स्थायी नहीं है। यह कई आंतरिक और बाहरी कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए, इसके दीर्घकालिक परिणामों को समझने के लिए संतुलित और आलोचनात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है।

 

निष्कर्षः

इस शोध के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि चीन में नौसैन्य राष्ट्रवाद और राज्य वैधता के बीच एक गहरा और परस्पर निर्भर संबंध मौजूद है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने अपनी राजनीतिक वैधता को बनाए रखने और मजबूत करने के लिए केवल आर्थिक विकास पर निर्भर रहने के बजाय राष्ट्रवाद-विशेष रूप से नौसैन्य राष्ट्रवाद-को एक प्रभावी उपकरण के रूप में विकसित किया है। यह रणनीति चीन को न केवल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करती है, बल्कि घरेलू स्तर पर भी सरकार के प्रति समर्थन को बढ़ाती है।

 

नौसैन्य शक्ति के विस्तार, दक्षिण चीन सागर में सक्रियता, ताइवान के प्रति कठोर रुख और समुद्री क्षेत्रों पर बढ़ते दावे ये सभी केवल रणनीतिक कदम नहीं हैं, बल्कि वे एक व्यापक राजनीतिक परियोजना का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय गौरव को पुनर्जीवित करना और जनता को एक साझा पहचान के तहत संगठित करना है। “Century of Humiliation” की ऐतिहासिक स्मृति को आधार बनाकर चीन यह संदेश देता है कि एक मजबूत नौसेना ही देश को सुरक्षित और सम्मानित बना सकती है।

 

हालांकि, इस रणनीति के कुछ अंतर्निहित जोखिम भी हैं। अत्यधिक राष्ट्रवाद सरकार के लिए दबाव का कारण बन सकता है और क्षेत्रीय संघर्ष की संभावना को बढ़ा सकता है। इसके अलावा, यदि आर्थिक विकास की गति धीमी होती है, तो केवल राष्ट्रवादी भावनाओं के आधार पर वैधता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि चीन की यह नीति अल्पकाल में प्रभावी है, लेकिन दीर्घकाल में इसकी स्थिरता कई आंतरिक और बाहरी कारकों पर निर्भर करेगी।

 

अंततः,यह अध्ययन यह दर्शाता है कि आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सैन्य शक्ति और राष्ट्रवाद का उपयोग केवल बाहरी शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि आंतरिक राजनीतिक स्थिरता और वैधता को बनाए रखने के लिए भी किया जाता है। इस दृष्टि से, चीन का उदाहरण अन्य देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय बन जाता है।

 

सुझावः

इस अध्ययन के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जो न केवल चीन के लिए, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए भी प्रासंगिक हैं:

1.   क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना:

दक्षिण चीन सागर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तनाव कम करने के लिए बहुपक्षीय वार्ता (multilateral dialogue) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

2.   अंतर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान:

समुद्री विवादों के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून (UNCLOS) जैसे अंतर्राष्ट्रीय नियमों का पालन आवश्यक है।

3.   संतुलित राष्ट्रवाद:

चीन को अत्यधिक आक्रामक राष्ट्रवाद से बचते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे।

4.   कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता:

सैन्य शक्ति के प्रदर्शन के बजाय कूटनीति और संवाद के माध्यम से विवादों को सुलझाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

5.   आंतरिक विकास पर ध्यान:

दीर्घकालिक वैधता के लिए चीन को आर्थिक और सामाजिक विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि केवल राष्ट्रवाद पर निर्भरता कम हो।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची :-

1.      Anderson, B. (1983). Imagined Communities. Verso.

2.      Callahan, W. A. (2010). China: The Pessoptimist Nation. Oxford University Press.

3.      Fravel, M. T. (2019). Active Defense: China’s Military Strategy. Princeton University Press.

4.      Hayton, B. (2014). The South China Sea: The Struggle for Power in Asia. Yale University Press.

5.      Mahan, A. T. (1890). The Influence of Sea Power upon History. Little, Brown and Company.

6.      Shirk, S. (2011). Changing Media, Changing China. Oxford University Press.

7.      Smith, A. D. (1991). National Identity. University of Nevada Press.

8.      Waltz, K. N. (1979). Theory of International Politics. McGraw-Hill.

9.      Weber, M. (1978). Economy and Society. University of California Press.

10.   Zhao, S. (2009). Deng Xiaoping’s Long War. Routledge.

11.   Permanent Court of Arbitration (2016). South China Sea Arbitration Award.

12.   Johnston, A. I. (2003). “Is China a Status Quo Power?” International Security, 27(4), 5–56.

13.   Ross, R. S. (2009). “China’s Naval Nationalism: Sources, Prospects, and the U.S. Response.” International Security, 34(2), 46–81.

14.   Kaplan, R. D. (2010). Monsoon: The Indian Ocean and the Future of American Power. Random House.

15.   Erickson, A. S. and Goldstein, L. J. (2009). China Goes to Sea. Naval Institute Press.

16.   Swaine, M. D. (2011). America’s Challenge: Engaging a Rising China. Carnegie Endowment.

17.   Glaser, B. S. (2012). “Armed Clash in the South China Sea.” Council on Foreign Relations Report.

18.   Holmes, J. R. and Yoshihara, T. (2008). Chinese Naval Strategy in the 21st Century. Routledge.

19.   Yoshihara, T. and Holmes, J. R. (2010). Red Star over the Pacific. Naval Institute Press.

20.   Friedberg, A. L. (2011). A Contest for Supremacy: China, America, and the Struggle for Mastery in Asia. W.W. Norton.

21.   Ikenberry, G. J. (2008). “The Rise of China and the Future of the West.” Foreign Affairs, 87(1), 23–37.

22.   Nye, J. S. (2011). The Future of Power. Public Affairs.

23.   Beckley, M. (2018). Unrivaled: Why America Will Remain the World’s Sole Superpower. Cornell University Press.

24.   Buzan, B. (2010). “China in International Society.” The Chinese Journal of International Politics, 3(1), 5–36.

25.   Foot, R. (2014). China, the UN, and Human Protection. Oxford University Press.

 

 

Received on 09.05.2026      Revised on 17.06.2026

Accepted on 27.07.2026      Published on 17.08.2026

Available online from August 22, 2026

Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(3):163-172.

DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00030

©A and V Publications All right reserved

 

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License. Creative Commons License.